देवर ने प्यासी भाभी और ननद को एक साथ चोदा – गाँव की गर्म रात की सेक्स कहानी
Devar Ne Bhabhi Aur Nanad Ko Ek Saath Choda- Gaon Ki Garmi Bhari Raat Ki Sachchi Desi Sex Story
दो महीने से प्यासी भाभी और कुंवारी ननद को देवर ने गाँव के घर में एक साथ चोदा। भाभी की रसीली चूत और ननद की टाइट कुंवारी चूत का पूरा मज़ा। देसी थ्रीसम सेक्स कहानी हिंदी में।
मेरा नाम रितेश है। मैं उस वक्त 22 साल का था, पुणे में इंजीनियरिंग कर रहा था और हॉस्टल की बोरियत से बचने के लिए दोस्तों के साथ एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर लिया हुआ था। जिंदगी मस्ती और मौज में कट रही थी, लेकिन जो कुछ आगे हुआ, उसने मेरे अंदर की आग को हमेशा के लिए जला दिया।
हमारे बगल वाले फ्लैट में जसवंत भैया और उनकी बीवी मंजुला भाभी रहते थे। जसवंत भैया दिनभर ऑफिस, रात को शराब और फिर खर्राटे। भाभी अकेलीपन की शिकार थीं। मंजुला भाभी की उम्र कोई 27-28 रही होगी, लेकिन जिस्म ऐसा कि देखते ही लंड तन जाए। गोरा-गोरा रंग, भारी-भरकम स्तन जो ब्लाउज में कैद रहने को राज़ी नहीं थे, चौड़ी कमर, मोटी-मोटी जाँघें और एक ऐसी मटकती हुई गांड कि चलते वक्त मेरी नज़रें अपने आप वहाँ चिपक जातीं। होंठ गुलाबी, आँखें काजल से भरी हुईं और मुस्कान ऐसी कि दिल में तीर की तरह चुभ जाए।
जसवंत भैया की छोटी बहन शीला कभी-कभी उनसे मिलने आती थी। शीला कॉलेज में थी, उम्र कोई 19-20। दुबली-पतली, लेकिन जिस्म में आग भरी हुई। छोटे-छोटे स्तन, पतली कमर, और चूतड़ इतने टाइट कि जींस में से भी उभरे हुए लगते। उसकी आँखों में शरारत थी और होंठों पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान।
एक दिन जसवंत भैया और भाभी अपने गाँव चले गए। उस ज़माने में मोबाइल नहीं थे, लैंडलाइन भी मुश्किल से। शीला उनके फ्लैट में अकेली रह गई थी। कई दिन बीत गए, कोई खबर नहीं। एक शाम करीब आठ बजे मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा खोला तो शीला खड़ी थी – सादा सलवार-कमीज़, दुपट्टा सरक गया था, बाल बिखरे हुए। उसकी आँखों में डर था और कुछ और भी जो मैं तुरंत समझ गया।
“रितेश भैया… प्लीज़ मेरे साथ गाँव चलो ना। भैया-भाभी अभी तक नहीं लौटे, मुझे अकेले डर लग रहा है।”
मैंने मुस्कुरा कर कहा, “अरे छोटी बहन के लिए तो जान भी हाज़िर है।”
पर मन ही मन सोचा – पराई बहन भी कोई बहन होती है?
अगली सुबह हम दोनों बस पकड़ कर गाँव पहुँचे। गाँव का मकान पुराना था, आँगन बड़ा, चारों तरफ़ खेत। जसवंत भैया कहीं दिखाई नहीं दिए। भाभी खेत से लौट रही थीं – साड़ी पसीने से तर, शरीर से चिपकी हुई, मंगलसूत्र गले में झूल रहा था, ब्लाउज गीला होकर स्तनों के आकार को साफ़ उघाड़ रहा था। मुझे देखते ही उनकी आँखें चमक उठीं।
“अरे रितेश… तू? और शीला?”
मैंने पूछा, “भैया कहाँ हैं?”
भाभी ने होंठ चबाते हुए कहा, “क्यों… मैं अकेली कम हूँ क्या? भैया के बिना नहीं चलेगा?”
शीला हँस पड़ी, “भाभी, हम तो आपको ही ढूंढने आए थे।”
बातों-बातों में सच सामने आया। किसी ने जसवंत भैया को पुरानी अफवाह सुना दी थी कि शादी से पहले मंजुला का किसी रतिलाल नाम के लड़के से चक्कर था। बस, उसी दिन से भैया का व्यवहार बदल गया। सुबह खेत चले जाते, रात को आकर खाना खाते और सो जाते। न बात, न स्पर्श, न चुदाई। पूरे दो महीने से भाभी तरस रही थीं। उनकी आँखें बताती थीं कि वो अंदर से जल रही हैं।
रात का खाना खाकर हम तीनों एक ही कमरे में थे। लाइट मद्धम थी, बाहर झींगुर बोल रहे थे। शीला ने सीधा सवाल दागा, “भाभी, सच बताओ… तुम्हें पहले कभी किसी ने चोदा था?”
भाभी शर्मा गईं, फिर धीरे से बोलीं, “नहीं रे… तुम्हारे भैया ने ही सुहागरात को पहली बार लिया था। खून भी निकला था, उन्होंने खुद देखा था।”
शीला ने मेरी जाँघ पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, “तो अब क्या… दो महीने से भाभी की प्यास कोई बुझाएगा कि नहीं?”
हवा में बिजली-सी कौंध गई। भाभी की साँसें तेज़ हो गईं। शीला ने भाभी का हाथ पकड़ा, उनकी हथेली पर उँगलियाँ फेरीं, फिर धीरे से उनके गाल पर। भाभी ने कुछ नहीं कहा, बस आँखें बंद कर लीं। शीला ने उन्हें अपनी गोद में खींच लिया। दोनों के जिस्म सट गए। शीला ने भाभी के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले हल्का-सा स्पर्श, फिर जीभ अंदर। लंबा, गहरा, गीला चुंबन। भाभी की साड़ी का पल्लू सरक गया, स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे।
मेरा लंड पजामे में तनकर दर्द करने लगा। शीला ने किस तोड़ा, मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई और बोली, “भैया, तुम तो कहते थे ना कि भाभी के स्तन दबाने का मन करता है? आज मौका है।”
मैं हकलाया, “मैं तो तेरे स्तनों की बात कर रहा था…”
शीला हँसी, “बहन के स्तन भाई नहीं छूता… भाभी के तो छू सकता है ना?”
भाभी ने शर्मा कर साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिरा दिया, फिर ब्लाउज के हुक खोल दिए। उफ्फ… क्या नज़ारा था! दो भारी-भरकम रसीले स्तन, गुलाबी निप्पल तने हुए, हल्की-हल्की नीली नसें दिख रही थीं। मैंने दोनों स्तनों को हाथों में लिया – गर्म, मुलायम, भारी। दबाया, मसला, निप्पल्स को उँगलियों से मरोड़ा। भाभी की आह निकल गई, “उफ्फ… रितेश…”
शीला ने मेरा पजामा नीचे खींचा, मेरा 7 इंच का मोटा लंड बाहर आ गया – सख्त, नसें फूली हुईं, सुपारा लाल। उसने मुठ्ठी में जकड़ा और धीरे-धीरे हिलाने लगी। फिर भाभी को चारपाई पर लिटाया, खुद सलवार-कमीज़ उतार फेंकी। उसकी कुनवारी चूत पर हल्के बाल, गुलाबी फाँक चमक रही थी। वो भाभी की जाँघों पर बैठ गई, दोनों की चूतें एक-दूसरे से रगड़ने लगीं। भाभी की चूत दो महीने की प्यास से पूरी तरह भीगी हुई थी, शीला की कुनवारी चूत भी रस छोड़ने लगी। कमरे में चिपचिपी आवाज़ें गूँजने लगीं।
मैं पीछे से शीला की गांड पकड़कर अपना लंड उसकी गांड की दरार में रगड़ने लगा। शीला ने सिसकारी भरी, “पहले भाभी को चोदो भैया… वो बेचारी तरस रही हैं।”
भाभी ने अपनी जाँघें चौड़ी कर दीं, साड़ी कमर तक ऊपर उठा दी। उनकी चूत पूरी तरह खुली थी – गुलाबी, मोटे होंठ, बीच में चिकनी गड्ढी तरस रही थी। मैंने लंड का सुपारा उस पर रखा और एक जोर का धक्का मारा। पूरा लंड फचाक से अंदर तक। भाभी की चूत गर्म, मुलायम और रसीली थी। “आह्ह्ह… देवरजी… मार डालो…” उनकी आवाज़ काँप गई।
मैंने कमर पकड़कर तेज़-तेज़ ठोकना शुरू किया। हर धक्के में भाभी का जिस्म हिल रहा था, भारी स्तन उछल-उछल कर मेरे सीने से टकरा रहे थे। शीला उनके ऊपर झुककर उनके होंठ चूस रही थी, एक स्तन दबा रही थी। सिर्फ़ बारह-पन्द्रह धक्कों में भाभी झड़ गईं – उनकी चूत ने मेरे लंड को ज़ोर से जकड़ा, रस की बौछार हुई, कमर ऊपर उठाकर वो चिल्लाईं, “बस… हो गया… आह्ह्ह… मर गई…”
लंड बाहर निकाला तो रस से लथपथ था। शीला ने तुरंत अपनी गांड पीछे खिसकाई। उसकी कुनवारी चूत पर मैंने लंड रखा। पहले सिर्फ़ सुपारा अंदर गया, शीला ने दाँत भींचे, “डाल दो भैया… पूरा… फाड़ दो मुझे…”
मैंने एक ज़ोर का धक्का मारा। झटके से सील टूट गई, हल्का खून बहा। शीला ज़ोर से चीखी, फिर खुद कमर हिलाने लगी। “अब दर्द कम है… चोदो मुझे… पूरी ताकत से…”
मैं दोनों को बारी-बारी चोदता रहा। कभी भाभी की ढीली-ढाली, रसीली चूत में, कभी शीला की टाइट, कुंवारी चूत में। दोनों पूरी तरह मदमस्त थीं – न शर्म, न हिचक। भाभी बार-बार कह रही थीं, “और ज़ोर से देवरजी… आज फाड़ दो मुझे…” शीला चिल्ला रही थी, “भैया… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… रोज़ चोदना मुझे…”
पूरे पैंतालीस मिनट तक चुदाई चली। मैंने पहले भाभी की चूत में झड़ा – गर्म वीर्य उनकी कोख में भर दिया। बीच में शीला तीन बार और भाभी चार बार झड़ीं। फिर शीला ने मेरा लंड मुँह में लिया, गले तक उतारा, चूसा, चाटा। दस मिनट में फिर तन गया। इस बार मैंने शीला को ज़मीन पर लिटाया, दोनों टाँगें कंधों पर रखीं और ज़ोर-ज़ोर से ठोका। उसकी चूत से चिपचिपी आवाज़ें आ रही थीं। हम दोनों एक साथ झड़े – मैंने उसकी कोख में दूसरा माल उड़ेल दिया।
भाभी ने भी लंड मुँह में लेकर चूसा और मुझे उनके मुँह में झड़ने दिया। सारा वीर्य वो गले से नीचे उतार गईं, होंठ चाटकर बोलीं, “देवरजी का रस… कितना स्वादिष्ट…”
तीनों नंगे ही थककर सो गए। सुबह भैया लौटे, कुछ पता नहीं चला। हम तीनों पुणे वापस आ गए।
उस दिन के बाद मंजुला भाभी और शीला दोनों मेरी हो गईं। जब भी मौका मिलता – कभी भैया के बाहर जाने पर, कभी रात को छुपकर – हम तीनों मिलकर पूरी रात आग लगाते। भाभी की रसीली चूत और शीला की टाइट जवानी – दोनों का मज़ा अलग-अलग था।
आज भी जब वो दिन याद आता है, लंड अपने आप खड़ा हो जाता है।
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