दोस्त की बड़ी बहन की चुदाई – दिल्ली ट्रेनिंग में प्यासी दीदी के साथ हॉट सेक्स
Dost Ki Badi Bahan Ki Chudai – Delhi Training Me Pyasi Didi Ke Sath Hot Sex
दिल्ली में ट्रेनिंग के दौरान दोस्त की खूबसूरत और प्यासी बड़ी बहन की चुदाई की पूरी गर्मागर्म देसी कहानी। नशे में शुरुआत, की-होल से झांककर देखी गई अधूरी चुदाई और फिर रात भर की जंगली सेक्स की रोमांचक हिंदी कामुक कहानी।
मैं रवि हूँ, हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर में रहता हूँ और एक सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। मेरी ज़िंदगी सामान्य थी, लेकिन एक बार 45 दिन की लंबी ट्रेनिंग के लिए दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ मेरी कोई जान-पहचान नहीं थी, न रहने की जगह, न कुछ। तभी मेरा एक नया दोस्त, जो हाल ही में हमारे मोहल्ले में शिफ्ट हुआ था, उसके साथ अच्छी दोस्ती हो गई। जब मैंने उसे अपनी परेशानी बताई, तो उसने बेझिझक कहा, “यार, टेंशन मत ले। मेरी बड़ी बहन दिल्ली में ही रहती है। तुम उनके घर पेइंग गेस्ट बनकर रह लो। मैं जीजाजी और दीदी से बात कर लूँगा।”
उसने फोन किया और सब फिक्स हो गया। मैं दिल्ली पहुँचा और सीधा उनके घर गया। घर बड़ा आरामदायक था, लेकिन उसमें सिर्फ़ तीन लोग रहते थे—जीजाजी, दीदी और उनकी छोटी ननद संगीता। जीजाजी आर्मी में ऑफिसर थे, करीब 40 साल के, मजबूत कद-काठी वाले, लेकिन हफ्ते-दो हफ्ते में सिर्फ़ दो-तीन दिन के लिए घर आते थे।
दीदी की उम्र करीब 33 साल थी—गोरी-चिट्टी, लंबे काले बाल, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। उनकी बॉडी एकदम परफेक्ट थी—न ज्यादा मोटी, न ज्यादा पतली। कर्व्स ऐसे कि नज़रें अपने आप खिंच जातीं। और संगीता, 20-21 साल की, दुबली-पतली, साँवली रंगत, लेकिन बहुत क्यूट और मासूम सी।
शनिवार को मैं पहुँचा तो जीजाजी घर पर थे। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया, जैसे मैं उनका पुराना दोस्त हूँ। शाम को हम तीनों बाज़ार घूमने निकले, अच्छा खाना होटल से मँगवाया। रात में जीजाजी ने पेग बनाए। दीदी भी हमारे साथ बैठ गईं। मैं शुरू में थोड़ा शर्मा रहा था, लेकिन जीजाजी ने माहौल इतना हल्का कर दिया कि बातें बनने लगीं।
दीदी उस दिन नाइटी में थीं—पतली सी, बॉडी को हल्का सा हग करने वाली। उनके कर्व्स साफ़ नज़र आ रहे थे—भरे हुए बूब्स, पतली कमर, गोल हिप्स। हम तीनों ने धीरे-धीरे पिया, हँसी-मज़ाक हुआ, पुरानी बातें याद आईं। रात साढ़े दस बजे सब सोने चले गए। मेरा बिस्तर हॉल में लगा दिया गया था।
आधी रात को नींद खुली, पेशाब लगी। टॉयलेट जाते वक़्त दीदी-जीजाजी के कमरे से हल्की-हल्की आवाज़ें आईं। दरवाज़े में की-होल था, मैंने झाँक लिया। जो नज़ारा था, वो भूल नहीं सकता। दीदी बिलकुल नंगी थीं, बेड पर पीठ के बल लेटी हुईं, और जीजाजी उन्हें चोद रहे थे। दीदी की आँखें बंद थीं, होंठों से धीमी-धीमी सिसकारियाँ निकल रही थीं—“ओह्ह… आह… और ज़ोर से… मेरी जान…” लेकिन सिर्फ़ चार-पाँच धक्कों में ही जीजाजी झड़ गए और पलटकर सो गए।
दीदी ने आँखें खोलीं, थोड़ा बड़बड़ाईं—“हर बार यही… इतनी जल्दी… मेरी चूत तो प्यासी ही रह जाती है…” फिर उन्होंने खुद ही हाथ नीचे ले जाकर उँगलियाँ डालीं, धीरे-धीरे मसलने लगीं, सिसकारियाँ लेते हुए शांत हुईं और सो गईं। मुझे दीदी पर तरस आया। इतनी खूबसूरत औरत, और इतनी अधूरी प्यास।
सुबह जीजाजी को अचानक इमरजेंसी ड्यूटी पर राजस्थान जाना पड़ा। हम उन्हें एयरपोर्ट छोड़ा और दोपहर में लौटे। शाम तक संगीता अपनी सहेली के साथ किसी की सगाई में चली गई और बोली कि रात भर वहीं रुकेगी। अब घर में सिर्फ़ मैं और दीदी थे।
दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, “दिनू, आज तो बस हम दोनों हैं। होटल से कुछ अच्छा मँगवा लें? और हाँ, मैं थोड़ी जिन पी लूँगी। तुम भी साथ दो ना?” मैंने मना किया—अगले दिन ट्रेनिंग थी—लेकिन दीदी ने हँसकर कहा, “अरे, लेडीज़ ड्रिंक है। थोड़ा सा पी लो, मेरा साथ देना। अकेले अच्छा नहीं लगता।” उनकी मुस्कान और आँखों में कुछ ऐसा था कि मैं मान गया।
दीदी किचन से ग्लास, आइस और नमकीन लेकर आईं। पेग बनाते वक़्त उनका पल्लू गिर गया। वो साड़ी में थीं, गहरे गले का ब्लाउज़—उनके भरे-भरे बूब्स का क्लीवेज साफ़ दिख रहा था। मैंने नज़रें फेरीं, लेकिन लंड अपने आप तन गया। हमने दो-दो पेग पी लिए, फिर तीसरा, चौथा।
दीदी को नशा चढ़ गया—हँसी ज्यादा आने लगी, कदम लड़खड़ाने लगे। मैंने उन्हें सपोर्ट करके टॉयलेट तक छोड़ा। दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ था, झिरी से देखा—दीदी ने साड़ी ऊपर की, पैंटी नीचे सरकाई और पेशाब किया। उनकी गोल-मटोल, चिकनी गांड चमक रही थी। मेरा लंड पजामे में पूरी तरह खड़ा हो चुका था।
फिर मैं उन्हें बेडरूम में लिटाया। दीदी नशे में धुत्त, बोलीं, “दिनू… तुम भी यहीं सो जाओ ना मेरे पास… अकेले डर लगता है… नाइट लैंप जला दो।” मैं हॉल से अपना अंडरवियर और बनियान लिया और सिर्फ़ पजामा-बनियान में उनके पास लेट गया। दीदी की साड़ी इधर-उधर सिमटी हुई थी, पल्लू गिरा हुआ, ब्लाउज़ से बूब्स का आधा हिस्सा दिख रहा था। उन्होंने दीवार की तरफ़ ज्यादा जगह छोड़ी थी, जैसे मुझे इनवाइट कर रही हों। मैं दीवार की तरफ़ लेट गया।
शुरू में मैंने उन्हें सिर्फ़ दोस्त की बहन की तरह देखा था, लेकिन अब उनका गर्म बदन पास था। कल रात का सीन दिमाग में घूम रहा था। नींद नहीं आ रही थी। आधी रात को फिर पेशाब लगी। उठते वक़्त गलती से मेरा हाथ दीदी की जाँघों पर पड़ गया—साड़ी घुटनों से काफी ऊपर थी, नंगी, मुलायम जाँघें। करंट सा दौड़ गया। दीदी हली नहीं। पेशाब करके लौटा तो लंड फिर खड़ा था। सोचा, अगर थोड़ा और छू लूँ तो शायद पता न चले। मैंने नाइट लैंप ऑफ़ कर दिया, कमरे में पूरा अंधेरा। फिर धीरे से उनके करीब सरक गया।
पहले हाथ उनके पेट पर रखा—गर्म, मुलायम। कोई हलचल नहीं। धीरे से हाथ ऊपर सरकाया, ब्लाउज़ के ऊपर से एक बूब पर पहुँचा। ब्रा के ऊपर से ही दबाया—भारी, नरम, निप्पल सख्त हो रहे थे। फिर हाथ नीचे जाँघों पर। साड़ी और ऊपर सरकाई। दीदी हल्की सी हिलीं, लेकिन फिर शांत। मैंने हिम्मत की और पैंटी के साइड से उँगली अंदर डाली। दीदी की चूत पूरी गीली थी—गरम, चिपचिपी। उँगली आसानी से अंदर चली गई।
धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। तीन-चार बार में दीदी की आँखें खुल गईं। मैं डर से अकड़ गया। लेकिन दीदी ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया और खुद ही पैंटी नीचे सरका दी। फिर मेरी उँगली को और गहराई तक दबाया। मैं समझ गया—वो भी यही चाहती हैं। मैंने दूसरी उँगली भी डाली और तेज़ करने लगा। दीदी की साँसें तेज़ हो गईं, कमर हल्की ऊपर उठने लगी। मैं उनके और करीब सरका, होंठ उनके होंठों से सटा दिए।
दीदी ने आँखें बंद कीं और होंठ चूसने लगीं। फिर धीरे से बोलीं, “सैतान… कब से कर रहा है ये सब?” मैंने शर्मा कर कहा, “दीदी… कल रात मैंने देख लिया था… आप संतुष्ट नहीं थीं…” वो हँस पड़ीं, “तूने देखा? और आज मौका देखकर… अब मुझे इतना गरम कर दिया है कि रुक नहीं सकती। आज तू ही बुझा मेरी प्यास।”
उन्होंने खुद पैंटी पैरों से निकाल फेंकी। मैंने पजामा उतारा। दीदी ने मेरी बनियान खींची और मुझे पूरा नंगा कर दिया। हम दोनों बिलकुल नंगे थे। मैं उनके ऊपर लेट गया, बूब्स को मसलने लगा, निप्पल्स को मुँह में लेकर चूसा। दीदी मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रही थीं, सिसकारियाँ ले रही थीं। फिर उन्होंने मेरा लंड पकड़ा—पूरी तरह खड़ा, गरम। बोलीं, “वाह… कितना मोटा और लंबा है… अब असली खेल।”
मैंने लंड उनकी चूत पर रखा। गीली चूत में सुपाड़ा आसानी से अंदर गया। दीदी ने कमर ऊपर उठाई और मुझे पूरी तरह अंदर खींच लिया। मैं धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। उनकी चूत टाइट, गरम और रसीली थी। एक ज़ोर का धक्का मारा तो पूरा लंड अंदर तक। दीदी चिल्लाईं, “आआह… कितना अच्छा लग रहा है…” मैंने स्पीड बढ़ाई। दीदी ने मेरी गांड पर उँगली घुसेड़ी, मैंने भी उनकी गांड में उँगली डाली। अब कमरे में सिर्फ़ चुदाई की चप-चप और दीदी की आहें गूँज रही थीं।
दीदी बोलीं, “और ज़ोर से… मेरी जान… आज तक किसी ने मुझे ऐसा नहीं चोदा… जीजाजी तो चार धक्के मारकर सो जाते हैं… आज मैं पूरी तरह तेरी हूँ… चोद मुझे ख़ूब…” उनका बदन काँपने लगा, चूत ने लंड को जोर से जकड़ लिया—वो झड़ गईं। लेकिन मैं नहीं रुका। दीदी फिर गरम हो गईं, नीचे से कमर उछालने लगीं—“चोद… अपने दोस्त की बहन को ख़ूब चोद… मेरी चूत की सारी प्यास बुझा दे…”
दूसरी बार वो और ज़ोर से झड़ीं। मैंने और तेज़ किया और उनकी चूत में ही झड़ गया। हम पसीने से तर, एक-दूसरे से लिपटे लेटे थे। थोड़ी देर बाद दीदी उठीं, पेशाब करके आईं और बोलीं, “तेरा लंड तो कमाल का है… अभी भी तैयार लग रहा है।”
मैंने हँसकर कहा, “अभी और चाहिए दीदी?” वो शरमाते हुए बोलीं, “हाँ… बहुत दिन बाद इतना मज़ा आया है।” उन्होंने मेरा लंड सहलाना शुरू किया। कुछ ही देर में फिर खड़ा हो गया। दीदी ने सुपाड़ा मुँह में लिया, जीभ से चाटा, गहराई तक चूसा। मैंने उनकी चूत चाटी—रस से भरी हुई। फिर हम 69 में आ गए—दोनों एक-दूसरे को पागलों की तरह चाटने-चूसने लगे। दीदी बेकाबू हो गईं, “बस… अब नहीं रुक सकती… जल्दी डाल अंदर।”
मैंने कहा, “घोड़ी बन जाओ।” दीदी तुरंत पालथी हो गईं, गांड ऊपर उठाई। मैंने पीछे से लंड डाला और उनकी कमर पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से ठोकने लगा। दीदी चिल्ला रही थीं—“हाँ… फाड़ दो मेरी चूत… आजा राजा… ख़ूब चोद मुझे…” वो दो बार और झड़ीं। फिर मैंने उनकी गांड में डालने की कोशिश की। पहले थोड़ा दर्द हुआ, दीदी ने सिसकारी, लेकिन फिर खुद कमर हिलाने लगीं—“डाल… सब कुछ तेरा है आज…” मैंने धीरे-धीरे पूरा डाला और चोदने लगा। आख़िर मैं उनकी गांड में ही झड़ गया।
सुबह तक हमने पाँच-छह बार चुदाई की—हर बार नई पोज़िशन, नया जोश। दीदी पूरी तरह संतुष्ट थीं, चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। जब संगीता लौटी तो हम पूरी तरह नॉर्मल हो गए। लेकिन उस रात के बाद दीदी और मेरे बीच एक मीठा, गुप्त रिश्ता बन गया। जब भी जीजाजी बाहर होते और संगीता कहीं busy, हम ख़ूब मज़ा लेते। ट्रेनिंग के उन 45 दिनों में दीदी ने मुझे वो सुख दिया जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।
दिल्ली की रातें बनीं सुहानी,
दोस्त की दीदी ने बुझाई प्यास पुरानी।
नशे में खुली चूत की गहराई,
उस रात फाड़ दी मैंने उनकी शर्म की परतें सारी।
लंड ने किया कमाल, दीदी चीखी बेकरार,
अब जब भी मौका मिले, चोदूंगा उन्हें बार-बार।
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